पोस्ट-ट्रुथ (post-truth) को हिंदी में क्या कहेंगे? सठीक शब्द का तो पता नही पर इसका मतलब थोड़ा बहुत समझने के लिए हम ये कह सकते है के जो सत्य से परे हो, सत्य जब सत्य न रहे, जब झूठ और सच में कोई अंतर न हो, जब सही गलत का विचार तथ्य या ज्ञान से न हो बल्कि भावनाओं के आधार पे हो उसे पोस्ट-ट्रुथ केह्ते है.

सत्य कि संधान क्यों?

सत्य, तथ्य, ज्ञान, इन विषय पे यूरोपियन सभ्यता ने 13वी सदी के आस पास सोचना शरू करा। उससे पहले इंसान सिर्फ धार्मिक ग्रंथों में जीवन/पृथ्वी का आधार ढूंढते थे। कोई सवाल नही, आलोचना क्रिटिसिज्म नही। फिर हुआ साइंटिफिक रेवोल्यूशन। इंसान समझ गया भगवान नही हम अपनी किस्मत खुद बना सकते है। यूरोपियन भले ही 13वी सदी से सत्य के खोज में हो, हिन्दू सभ्यता में सत्य की खोज वैदिक युग से चला आ रहा है। संस्कृत शोल्क “सत्यमेव जयते”, “सत्यम शिवम सुन्दरम” इसका प्रतीक है। सत्य ही शिव का एक और रूप है।

इस्लाम मे भी तथ्य और विज्ञान की दिशा में चलने को कहा गया है।

पेहेले भी विज्ञान की चर्चा हर समाज में रही लेकिन 19वीं सदी से science and technology ही पूरे विश्व मे हर समाज सभ्यता का आधार बन गया। ये हुआ आधुनिक युग, या modernity। ईस युग में ये समझा गया के ज्ञान या knowledge वही जो सच हो, और सच वो जिसे देखा सुना जाए, जांचा परखा जाए। भावनाओं को नॉलेज नही मानेंगे। मॉडर्न टाइम्स का सबसे बड़ा दान है इंडस्ट्रियल रेवोल्यूशन। मशीन ने दुनिया मे अधिपत्य गाड़ ली। इंसान को मशीन के अलावा कुछ भी समझ नही आता बस एक के बाद एक नया नया अविष्कार, कभी चांद, कभी मंगल, इंसान से रोबोट, रोबोट से इंसान, जेनेटिक बैंगन।

प्रगति प्रगति प्रगति। फिर थकावट।

प्रगति करते करते इंसान मशीन से हि ऊब गया। तो आया पोस्ट मॉडर्निज़्म (Post modernism). ईस युग मैं ग्यान विग्यान फेमिनिस्ट्स, ब्लैक / दलित एक्टिविस्ट्स, स्पिरिचुअल गुरु ने बोला मशीन तो ठीक है पर भावनाओं को भी समझो। इंसान की आप बीती, आंसू, हँसी, डर, ये भी ज्ञान ही है, सत्य है। आस्था, आध्यात्मिक विषय पे फिर चर्चा शुरू हुआ। ये देखा गया एक एक युग के बाद इंसान थक जाता है और एकदम दिशा बदल देता है। मॉडर्निटी के बाद आया पोस्ट मॉडर्निज़्म और पोस्ट ट्रुथ उसी दिशा में एक और लंबी छलांग है। सत्य की खोज करते करते अब लोग सत्य से ही ऊब गए। तो भाँड़ में जाय सत्य, जो मुझे ठीक लगेगा, बस वही सत्य, क्या उखाड़ लोगे?

पोस्ट-ट्रुथ और पॉलिटिक्स का सम्बन्ध

अव ये जो समय आया, जब इंसान को लगने लगा के जो मुझे अच्छा लगेगा वही सत्य उसके आगे पीछे मुझे कुछ नही सुनना, इसी समय आया internet/ सोशल मीडिया और ट्रम्प मोदी जैसे नेता। इन नेताओं को बस ये करना था के अपने पर्सनालिटी से करोड़ों का दिल जीतना था। बस फिर क्या, इस भीड़ को कुछ भी सच लगेगा। मोदी ट्रम्प जैसे लीडर्स पोस्ट ट्रुथ पॉलिटिक्स के मुख्य हिस्सा है। इनकी मास अपील, पर्सनालिटी बहत स्ट्रांग है, और ये इंसान के दुखती रग को भले भांति जानते है, ये अप्रिय सत्य नही बोलते है सुंदर झूठ बोलते है जो लोगों को अच्छा लगता है। फिर सोशल मीडिया द्वारा झूठ और फैलाई जाती है।

राजनैतिक नेताओं का दैनंदिन झूठ – पोस्ट-ट्रुथ एक पोलिटिकल हथियार

United Kingdom में हाल ही में हुए Brexit का चुनाव, USA में डोनाल्ड ट्रम्प और भारत में नरेंद्र मोदी का चुनाव इन सभी के पीछे पोस्ट-ट्रुथ याने सोशल मीडिया द्वारा फैलाई गई नैरेटिव का हाथ बताया जाता है. इन लीडर्स के जो भक्त है वो इन्हे भगवान मानते है, और इनके मुँह से निकली एक एक बात को सच मानते है| इंडिया में पिछले कुछ दिनों में देखा गया है के अक्सर मोदी जी कुछ भी झूठ बोल देते है और उस कोई सवाल नहीं उठता। उन्होंने नेहरू पे आक्रमण किया ये बोल के नेहरू कभी भगत सिंह से मिलने नहीं गए. ये सरासर झूठ है, August 8, 1929 को नेहरू उनसे मिले और सबूत के तौर पर इस मुलाकात की खबर 10th August 1929 Tribune अख़बार में भी छपी गई. जिस बात की ताथ्यिक प्रमाण मौजूद है उसको भी झुठलाते है ये लीडर्स, लेकिन इनके भक्तो को बुरा नहीं लगता, ये सवाल नहीं उठाते यहाँ तक के प्रमाण दिखाने के झूठ को मानते है.

ऐसे बहत example है पोस्ट-ट्रुथ पे। मेरे इस ब्लॉग पे मैं इस विषय पे लिखती हूँ. इसे फॉलो करे.

पोस्ट-ट्रुथ (post-truth) क्या है? इसके साथ भारत के राजनीती का क्या सम्बन्ध है? नरेंद्र मोदी किस प्रकार के पोस्ट-ट्रुथ फैलाते है? जानने के लिए पड़े और शेयर करें।